ज्ञानरंजन जी को 'संगत' में मैंने भी सुना। फौरी प्रतिक्रियाओं के तौर पर हुए उनके मूल्यांकन (?) से मेरी भी बहुत हद तक सहमति थी। लेकिन पानी की सतह पर तैरते बुलबुलों के बैठने के बाद ऐसा भी लगा कि उस पर थोड़ा ठहर कर सोचना चाहिए। यदि उस साक्षात्कार की ऊपरी परतों को हटाकर देखा जाए तो इसमें एक लेखक का खुद के लिए और अपने लेखन के लिए प्यार, आत्मसम्मान और नि:संकोचपन शामिल था। इसमें कई बातें बेहद खरी, कड़वी और सच्ची भी थीं। जब वे वाम पक्ष की असहिष्णुता की बात करते हैं, तो वह मार्क्सवाद की आलोचना नहीं होती, बल्कि हमारे देश और समाज के संदर्भ में वामपंथी राजनीति की व्यावहारिक समीक्षा होती है। किसी विचार के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखते हुये उसके समीक्षा की बात करने के लिए साहसी से अधिक दुस्साहसी होना जरूरी होता है।
ज्ञान जी की इस बात में भी दम है कि 'हिंदी का बड़ा लेखन छोटे शहरों में हुआ।' दिल्ली जैसे बड़े केंद्रीय शहर और छोटे शहरों की यह रस्साकशी साहित्य में हर युग में चलती रही है। क्या वे लेखक जो खुद को दिल्ली या किसी अन्य बड़े शहर का कहते हैं, किसी छोटे शहर की व्युत्पत्ति नहीं हैं? सवाल यह भी है कि उन शहरों को अपने में से निकाल देने के बाद, क्या वे लेखक या फिर वैसे ही लेखक रह जायेंगे?
मुश्किल यह भी हुआ कि बड़ी कहानी के बतौर अपनी ही कहानी 'घंटा' का नाम उन्होंने ले लिया। वे चाहते तो कई अन्य कहानियों के नाम ले सकते थे। लेकिन उन्होंने नहीं किया ऐसाा। सच है कि यह बहुत एथिकल नहीं है। लेकिन, अपने किये, अपने लिखे से मोह होता है, और सबको होता है। यह लाजिमी भी है, खासकर उम्र के उस पड़ाव पर, जब लेखन और लिखने की दुनिया वैसी ही न रह गई हो, जैसी उनके समय हुआ करती थी।
हम लिखने-पढ़ने वाले लोग, खुदा को नहीं खुद को ही हाजिर-नाजिर जान कर एक बार यह सोचें कि क्या जब किसी खास विषय या खास तरह के लेखन की बात चलती है, हमें यह नहीं याद आता कि इस विषय पर हमारी भी रचना है और अच्छी है? कई बार यह भी लग सकता है कि उक्त विषय पर चर्चित हो रही रचना से तो बहुत बेहतर है, पर आप डिप्लोमेटिक होने लगते हैं और ऐसा नहीं कहतें कि खुद से यह कहते अच्छा नहीं लगेगा…लोग आत्ममुग्ध समझेंगे... आदि-आदि
‘घंटा' कहानी पर ज्ञानजी को पहले भी घेरा जाता रहा है और यहां भी वे उसका नाम लेते ही 'आ बैल मुझे मार' वाली स्थिति में आ गये। लेकिन जिस तरह पूरी चर्चा एक वाक्य पर आकर सिमट गई वह उचित नहीं था। यह सच है कि संवाद पात्र के होते हैं, कहानीकार के नहीं। तदनुरूप मन: स्थितियां भी... बेहतर होता उसी कहानी में आए उन संदर्भों के हवाले से उनकी स्त्री दृष्टि को प्रश्नांकित किया जाता जो पात्र विशेष से अलग वाचक और लेखकीय विवरण का हिस्सा हैं।
जानबूझकर उन प्रसंगों को मैं यहाँ उद्धृत नहीं कर रही, ताकि कोई चाहे तो स्वयं उन बारीकियों में जाकर देखे। वैसे भी सोशल मीडिया के इस युग में पाठ की वह सूक्ष्मता अब कम ही दिखती है। सच यह भी है कि सिर्फ ज्ञानरंजन ही नहीं, उनकी पीढी के अधकांश लेखकों की यह दिक्कत है। अमूमन इनकी कहानियों की स्त्रियां दमित-दलित और बेहद कमजोर रही हैं। लेखक अगर स्त्री के पक्ष में खड़े होने की बात भी करते हैं तो 'अहं ब्रह्मास्मि' के भाव से भरकर। वे उसके उद्धारक होते हैं, साथी-सहकर्मी और सखा तो बिलकुल नहीं। हिन्दी साहित्य में स्त्री द्वेष की यह धारा वहीं रुकी नहीं, बल्कि कालांतर में और तेज भी हुई।
इस बात पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है कि ‘घंटा’ कहानी के एक वाक्य पर अटका हिन्दी समाज इस बात को चर्चा के लायक भी नहीं समझ सका कि स्त्री लेखकों को ‘पहल सम्मान’ न दिये जाने के प्रश्न का जवाब उन्होंने किस हलकेपन से दिया। 'पहल सम्मान' के लिए कभी विचारार्थ आए कुछ स्त्री रचनाकारों के संदर्भ में यह तर्क कि उन्हें फिर कभी दे दिया जाएगा, के पीछे अनुकंपा भाव नहीं तो और क्या है? ‘पहल सम्मान’ और उदय प्रकाश के संदर्भ में ज्ञानरंजन की बातों पर दुख और रोष जताने वाले लोगों के बीच इस विषय पर चुप्पी क्यों रही, इस प्रश्न का उत्तर एक गहरे आत्ममंथन की मांग करता है। स्त्री विषयक संदर्भों में आलोचक रश्मि रावत द्वारा उठाए प्रश्नों को भी इसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए। इस तरह देखें तो ज्ञानरंजन का यह साक्षात्कार सिर्फ उनकी स्त्री दृष्टि को ही नहीं, बल्कि आज के बड़े लेखक समाज की स्त्री दृष्टि को समझने में भी उतना ही सहायक है।
ज्ञानरंजन जी ने इस इंटरव्यू मे़ एक सच्चाई यह भी उजागर की कि कैसे एक बार उनके जीवन में एक प्रेमिका का प्रवेश हुआ; मगर जल्द ही वह नैतिक रूप से सचेत और जागरूक हो गए, सामान्य जीवन में लौट आए और पहले की तरह सब कुछ सही और अच्छा हो गया। इस प्रसंग को सुनते हुये मुझे अमरकांत की कहानी ‘पलाश के फूल’ की याद हो आई, जिसमें लम्बे समय तक विवाहेतर प्रेम में रहने के बाद एक पुरुष ‘माया महा ठगिनी हम जानी' को बूझते हुये न सिर्फ प्रेम से मोहभंग की बात करता है बल्कि 'अब लौं नसानी, अब न नसैहौं' की तर्ज पर परिवार और धर्म की ओर उन्मुख हो जाने की राह पर भी चल पड़ता है। पंकज चतुर्वेदी ने इस प्रसंग की अच्छी विवेचना की है। गोया 'जो प्रेमिका कालान्तर में जीवन से चली गई, वह कोई मनुष्य नहीं, बल्कि खरपतवार थी और गृहस्थी के खेत को हमवार और उर्वर बनाए रखने के लिए उसकी सफ़ाई ज़रूरी थी।' बतौर स्त्री मुझे भी पंकज जी का यह विचार-पक्ष भला लगा। एक स्त्री एक विवाहित लेखक की ज़िन्दगी में आती है और फिर उसे मजबूर होकर जाना पड़ता है। दोनों ही तरह से और दोनों ही तरफ स्त्री की जो दुर्गति है, वह काबिले गौर यह मामला इतना सीधा, सरल और एकरैखीय नहीं होता कि किसी के निर्णय पर बहुत जजमेंटल हुआ जा सके। इसलिए, मुझे भी ज्ञानरंजन की स्वीकृति या उनके निर्णय पर एतराज नहीं है। पर इस संदर्भ में जो बात मुझे खटकती रही, वह यह कि दोनों ही स्त्रियों की संवेदना, विचारशीलता, आत्मसम्मान, वंचना और जद्दोजहद का यहां कोई भी ज़िक्र नहीं। वो यहां नदारत थी। अपने समय और अपनी भाषा का एक समर्थ कथाकार अपने जीवन में आई उन स्त्रियों के प्रति क्या सचमुच इतना तटस्थ या जड़ (?) हो सकता है? ज्ञानजी के संदर्भ में यह प्रश्न करते हुये मुझे मन्नू जी पर साहित्य अकादमी द्वारा बनाई गई फिल्म्म का वह दृश्य याद आ रहा है, जिसमें गहरे अपराधबोध और पश्चाताप से भरे राजेन्द्रजी कहते हैं- ‘मन्नू के प्रति मैंने न्याय नहीं किया’।
कई बार यह भी होता है कि जब हार थककर दूसरी स्त्री खुद निकल लेती है, पुरूष संत, पारिवारिक और त्यागी होने के चोले को जबरन ओढ लेता है। वह यह नहीं जाहिर होने देता कि यह उसका चुनाव नहीं, मजबूरी थी। लेकिन ज्ञानजी ने जिस तरह से इस प्रसंग का जिक्र किया है, उससे ऐसा नहीं लगता। बल्कि उससे उनकी एक ऐसी छवि बनती है, जो परिवार को सर्वाधिक महत्व देता है। हो सकता है, उस स्त्री का चला जाना ही उन्हें सब के हित में लगा हो।
प्रेमिकाओं के प्रवेश के कारण हिन्दी के बहुत सारे साहित्यकारों के यहाँ 'पत्नियों' का जो हाल रहा है, वह जग जाहिर है। वह भी अधिकतर प्रेम विवाहों में। वो यह नहीं चाहते थे, अपने परिवार के साथ... कभी-कभी प्रेम हो जाता है अनजाने-अनचाहे। विवाह से इतर भी...यह एक मानवीय वृत्ति है। उसके मद्देनज़र जो भी निर्णय लें, जैसा भी जीवन चुनें, हानि तो अवश्यंभावी है, कितनी , कब और किसकी, यह एक बड़ा प्रश्न है। लेकिन कोई एक तो होता ही है इसमें, जो पिसता है, अकेला रह जाता है।
इंटरव्यू में कही गई ज्ञान जी की बातों से सहमत, असहमत हुआ जा सकता है। इसकी छीछालेदार भी की जा सकती है, जैसे हुई भी और अभी भी जारी है... व्यक्तिपरक टिप्पणियों के लिए उन्हें, उनके लेखन-संपादन को, खारिज भी किया जा सकता है, गालियां दी जा सकती हैं, दी भी जा रही हैं... पर सहमति-असहमति से इतर एक और रास्ता हो सकता है, इसे नज़रअंदाज़ कर जाने का। अपने परिवार के किसी बुजुर्ग के द्वारा कहे गये अपशब्दों को बिसरा देने की तरह।
बहुत बार मैंने ‘संगत’ के इसी मंच पर लेखकों को नाटकीय और ढोंगी होते देखा है। अपनी गलतियों पर अड़ते और उसे जस्टिफाई करते हुये भी... कुछ को बेहद सहज तो कुछ को अपनी खोल से बाहर, अपने क्रोध और अहं के चरम पर भी... यह भी सुनने में आया कि कइयों ने या उनके परिवार वालों ने कहकर और दबाव डालकर इसके कुछ हिस्सों को संपादित भी करवाया। चाहते तो ज्ञानजी भी ऐसा कर सकते थे। समय भी बहुत मिला उन्हें, इस पर सोच-विचार करने के लिए, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। और ऐसा नहीं करने के लिए जितनी हिम्मत और साहस चाहिए, वह एक मूर्ति भंजक में ही हो सकता है। भले वह मूर्ति स्वयं की हो या किसी अन्य की...
मुझे लगता है कि यह जो हंगामा है वह इसलिए भी है कि उनके बोलने से कुछ बनी-बनाई मूर्तियों को चोट पहुँची है। शुचिता का वह तथाकथित आभामंडल भी प्रश्नांकित हुआ है।
नामवर जी और राजेंद्र जी को उन्होंने अपना दुश्मन कहा। इसके अलग कारण हैं और कई कारण हैं। यह दुश्मनी कत्तई वह नहीं जो आज हम लेखकों के बीच होती है। यदि वह दुश्मनी थी भी तो बराबर वालों के बीच थी, अपने विचारों, मूल्यों और तर्कों के साथ एक दूसरे से आगे निकलने की इस स्पर्द्धा के मूल में उनका वैचारिक अर्जन ही था।
नामवर जी बहुत विद्वान और अपनी तरह के अनूठे आलोचक रहे हैं तो ज्ञानरंजन भी निश्चित रूप से एक बेहतरीन कहानीकार और सम्पादक। आलोचना के अंक अनवरत निकले रहें इसके लिए नामवर जी को कोई व्यक्तिगत प्रयास नहीं करने पड़े होंगे ना ही उसके लियते कोई मामूली-गैर मामूली समझौता। एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान की पत्रिका होने के कारण उनके सामने पूंजी की ऐसी समस्या न थी, जैसी ज्ञानरंजन जी या फिर राजेंद्र जी के साथ थी। विधा और व्यक्तित्व-भिन्नता के साथ-साथ ऐसी भिन्नताएं भी दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करने में सबसे बड़ी बाधा है। नामवर सिंह आलोचक कैसे हैं इसपर अपना मत रखना अलग बात है पर अच्छा होता उन पर व्यक्तिगत हमला न किया जाता। ज्ञान जी ने नामवर जी के लिए जो भी कहा वह उनके जीते जी कहते।
एक बात जो इस इंटरव्यू में साफ-साफ दिखी, वह यह कि वे बहुत सोच समझकर या तय करके अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं दे रहे थे। वे अपनी रौ में थे और जो उन्हें उस वक्त उचित लग रहा था, वे वही कह रहे थे। यह साहस या तो उम्र गंवा देने या बिता देने पर आती है, या फिर बचपन की नि:शंकता में। जब भय नहीं होता, समय का, समाज का, अपनी छवि टूटने का। ज्ञानजी ने उम्र बिताई नहीं, एक सलीके के साथ गुजारी है, एक सार्थक उद्देश्य के लिए। अपनी जिद और 'पहल' के साथ। जहां आजादी थी उनके हिस्से, लेखकीय और संपादकीय स्वतंत्रता भी। उसकी एक तयशुदा कीमत भी।
मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं उनकी आत्म-स्वीकृतियां । उन्हें जिन बातों का दर्द था, जो बातें उन्हें सालती रहीं होंगी, उन्होंने की। उन्होंने कहा। वे एक साथ सबके आभारी भी दिखें और विरोधी भी... बातों के सिरे उलझ रहे थे एक-दूसरे से और वे इसे सुलझाते हुये सुलझ भी रहे थे, उलझ भी रहे थे। अपने अंतर्विरोधों को उन्होंने कई जगह रेखांकित किया है, जिसे उसी रूप में समझना चाहिए। इस इंटरव्यू ने बहुतों की तरह मेरे इस विश्वास को और सबल किया है कि 'मूर्तियों के भंजन के सामान उनके भीतर ही रखे होते हैं।'
उन्होने खुद को भी नहीं बख्शा। इमरजेंसी के समय 'पहल' को बचाने के लिए जो सहायता ली वे उसे उजागर करते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि 'उन्होंने बहुत कम कहानियाँ लिखीं और जो लिखीं उसके स्रोत क्या थे।' अब आप कह सकते हैं कि भई क्यों नहीं लिखी? किसने बांध रखा था आपका हाथ? तो आवेश में यह कहने से पहले रुकिए क्षण भर को, फिर सोचिए... उनका सम्पादक लेखक के ऊपर हावी होता चला गया। और सम्पादक के ऊपर अपनी पत्रिका को जीवित-जागृत रखने की जिद और लालसा। लेखक बेचारा तो अदना सा होता है इन दुनियावी उद्यमों के बीच। उसे तो आखिरकार...
हां, यहां मैं उनके उम्र की बात जरूर करना चाहूंगी। और यह कत्तई उन्हें ग्रेस मार्क देने जैसा नहीं है। यह मानवीय होना है। लेखक से भी पहले, उन्हें एक मनुष्य की तरह देखना। इस उम्र में उनका मलंग हो चलना स्वाभाविक है। वे एक सांस उदास दिख रहे थे, एक सांस बच्चे। एक सांस यह लग रहा था उन्हें देखकर कि वे निर्लिप्त हो चुके हैं सब दुख-सुख आगत-विगत से, दूजे सांस सब कुछ पा लेने की वही पुरानी जिद, कि समर तो अभी शेष है...
नवासी वर्ष का कोई शख्स उम्र की उस दहलीज पर खड़ा होता है, जहां पाने को कुछ भी शेष नहीं रहता और खो देने के लिए सबकुछ होता है। उम्र, रिश्ते, देह, यश और यह सारा संसार भी... और यह खो देना अवश्यंभावी है। आपकी कोई जिद, आपकी कोई चाहत, आपका कोई सगा, कोई औषधि इस सबकुछ के खो देने से आपको रोक नहीं सकती। सांसे सबकी छिननी है अंतत:। उम्र विशेष के इस पड़ाव के आसपास तो जरूर। ऐसे में जीवन को ललककर लपक लेने की चाह जागती है। कभी सबकुछ जकड़कर अपनी मुट्ठियों में कैद कर लेने की चाह, तो कभी बैरागी होकर सबकुछ खुले हाथ लुटा देने की। ज्ञान जी मुझे ठीक ऐसे ही लगे इस इंटरव्यू में।
हम सबने अपने घर-परिवार, आस-पड़ोस में ऐसे बुजुर्ग लोगों को देखा है या देखा होगा। मेरे पास ऐसी ही एक मां हुआ करती थी। दूसरे राजेंद्र जी (राजेंद्र यादव) को देखा कुछ हद तक। यह उम्र की वह देहरी है जब सारा किया-कराया क्षण में माटी हो सकता है। हो भी जाता है, तनिक सी लापरवाही में। खासकर जुबान और मन की ज़रा सी फिसलन याकि विचलन से। अब तक किये-धरे का सारा हिसाब- किताब कई बार मन में चलने लगता है। प्रतिदान चाहिए होता है, चाहिए होती है थोड़ी सी नर्मी, बहुत सारा स्नेह और अपनापा। अपनी बात का मान। अपने किये का गान। दूसरे न कहें तो खुद ही बार-बार गिनायेंगे। जतायेंगे-बतायेंगे। यह वे नहीं कर रहे होते, उनके भीतर का वह जिद्दी बच्चा कर रहा होता है... वह बुजुर्ग कर रहा होता, जो जानना चाहता है कि उसको, उसके किये धरे को कैसे याद किया जायेगा? याद किया जायेगा भी कि नहीं...
राजेंद्र जी के माध्यम से ही मैंने यह भी जाना कि जब सारी इ़द्रियां छीजने लगती हैं, धीरे-धीरे खोने लगते हैं हम अपना होना या उन पर से नियंत्रण। तब आकांक्षाएं उगने लगती हैं, बाहर आने लगती हैं शरीर और मन के हर कोने-कंदरे से निकलकर। मन उसके पीछे भागने लगता है। छोटी-छोटी ऐषणाएं, छोटे-छोटे सुख-दुख तब न जाने कितने बड़े हुये जाते हैं। कितने विरल।
ज्ञानजी ने वही कहा जो उन्होंने भोगा, जो उन्होंने सोचा, जो उन्हें उस वक्त लगा। यह अलग बात है कि वे उसे सम्पादित कर सकते थे। क्षमाभाव को प्रमुखता दे सकते थे, नहीं दे सके यह अलग बात। उम्र के इस पड़ाव पर यही उचित है, पर जरूरी कत्तई नहीं। उनका यह स्वीकार भी बहुत कुछ कहता है. “कंट्राडिक्शंस हो सकते हैं। हर बड़े व्यक्तित्व में। हर बड़े प्रयास में होते हैं। उनमें सुधार भी हो सकता है।” हर व्यक्ति के अंदर कई व्यक्ति होते हैं। उसका हर पहलू रमणीय और सुंदर हो , यह असंभव है। भरसक मनुष्य इस असुंदर को ढकता है, छिपाता है, सामने आने नहीं देता।
हां, एक जमाने में ऐसे लेखक थे जो अपने लेखन के लिए और दूसरे लेखकों के लिए भी जमीन समतल बनाने का काम भी किया करते थे। यह उनके दायित्व का हिस्सा होता था। ऐसे ही लेखकों में भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद जैसे लेखक हुए जो केवल हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता ही न थे बल्कि युग निर्माता भी बने। महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे लोग भी हुये, जिन्होंने अपने संपादन काल में कितने लेखकों को जन्म दिया पर लेखन की अपनी निजी महत्वाकांक्षा को पीछे कर दिया। पर यह कोई तयशुदा फार्मूला नहीं है और न होना चाहिए। न जीवन का, न लेखन का।
जब आज जीवन के तमाम उच्चादर्श स्वयं ही भरभरा कर नीचे गिर रहे हैं तो लेखकों से हीं ज्यादा उम्मीद क्यूं करनी चाहिए? यह प्रश्न किसी के लिए क्लीन चिट की अर्जी नहीं, बल्कि हमारे, समय, समाज और खुद हमारी ही समीक्षा की संभावित खिड़की की तरफ एक इशारा है। मुझे यह जरूरी लगता है, और आपको?