खबरों से आगे: जम्मू-कश्मीर में कम होती हिंसा अनुच्छेद-370 के गुजरे दौर के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि

15 अगस्त का मौका हो, 26 जनवरी या फिर दिल्ली से कोई वीआईपी मूवमेंट, जम्मू-कश्मीर से अलग ही तस्वीर सामने आती थी। अब इसमें बदलाव साफ तौर पर नजर आ रहा है।

एडिट
Srinagar: Security personnel stand guard as security is beefed up following the Supreme Court's verdict on the batch of petitions challenging the abrogation of Article 370 in Jammu and Kashmir, at Lal Chowk in Srinagar on Monday, December 11, 2023. (Photo: IANS/Umar Qadir)

प्रतीकात्मक तस्वीर- IANS

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए के हटने के बाद जपिछले कुछ वर्षों में क्या बदलाव आया है? गणतंत्र दिवस (रविवार, 26 जनवरी) पर केंद्र शासित प्रदेश में कहीं से भी हिंसा की एक भी घटना सामने नहीं आई। न ही सभी 20 जिलों में कहीं से ऐसी कोई रिपोर्ट मिली कि कोई अप्रिय घटना घटी हो।

दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोनमर्ग की ओर जाने वाली जेड मोड़ सुरंग के उद्घाटन के लिए गांदरबल जिले का दौरा किया था। कहीं भी कोई विरोध प्रदर्शन, कोई हिंसक घटना या काले झंडे आदि दिखाने की सूचना नहीं मिली। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर है। साफ तौर पर अतीत के उस दौर से अलग जब दिल्ली से किसी वीआईपी दौरे के समय ऐसी घटनाएं होती नजर आती थी, और कभी-कभी तो ऐसा बहुत होता था।

पिछले 25 वर्षों से जम्मू से रिपोर्टिंग करने वाले किसी व्यक्ति के लिए, हिंसा के स्तर में उल्लेखनीय रूप से कमी आना अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद के नतीजों में सबसे पहला अहम संकेत है। पिछले साल (2024 में) भी छिटपुट हिंसक घटनाएं हुई थीं, जिनमें से सबसे बड़ी घटना 9 जून की रियासी जिले में तीर्थयात्रियों की हत्या थी। यह वह दिन था जब प्रधानमंत्री मोदी को तीसरी बार पीएम पद की शपथ लेनी थी। शपथ ग्रहण से कुछ घंटे पहले आतंकवादियों ने इस हमले को अंजाम दिया था।

कुछ सालों पहले तक 26 जनवरी हो, 15 अगस्त या फिर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की जम्मू या कश्मीर घाटी की यात्रा, सुर्खियों में दिवंगत सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मलिक, आसिया अंद्राबी और ऐसे अन्य लोग रहते थे। गिलानी अब इस दुनिया में नहीं हैं। वहीं, अन्य लोग सलाखों के पीछे हैं, और लंबी सजा काट रहे हैं। इन दिनों, यहां तक ​​कि महबूबा मुफ्ती जैसी शख्सियत के लिए भी खबरों में बने रहना मुश्किल हो गया है, बावजूद इसके कि वे इस कोशिश में कई बाहर अजीबोगरीब बयान देती रही हैं।

चाहे वह अटल बिहारी वाजपेयी का जम्मू-कश्मीर का दौरा रहा हो, या फिर 10 साल प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह, या पिर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी या एपीजे अब्दुल कलाम...हमेशा यह अलगाववादियों के लिए अखबार के पहले पन्ने पर जगह बनाने का एक अवसर हता था। आमतौर पर वे आईईडी विस्फोट करके, या दूरदराज के इलाकों में कुछ चुनिंदा हत्याओं को अंजाम देकर ऐसा करते थे। कभी-कभी बंदूकधारी आतंकवादी ऐसी यात्राओं की पूर्व संध्या पर भारत विरोधी बयानबाजी करते हुए वीडियो तक जारी करते थे।

अक्सर कुछ राजनेता यह दावा करते रहते हैं कि वे अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए की बहाली के लिए काम करेंगे। वे जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति की बहाली कराने की कोशिश करेंगे, लेकिन साफ तौर पर उनके शब्दों में कोई दृढ़ता नहीं है। वे भी जानते हैं कि जब तक केंद्र में भाजपा सरकार सत्ता में है, यानी कम से कम 2029 की शुरुआत तक, ऐसा नहीं होने वाला है।

यह ये भी जानना चाहिए कि एक समय में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति पूरे देश में सबसे शक्तिशाली होता था। यह राज्य के लिए एक अलग संविधान की वजह से था जिसने उन्हें व्यापक शक्तियाँ दे रखी थी। आज जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) का दर्जा दिए जाने के बाद वर्तमान सीएम उमर अब्दुल्ला संभवत: सबसे कमजोर न सही लेकिन कमजोर मुख्यमंत्रियों की लिस्ट में जरूर हैं। वह भी इसे अच्छी तरह से जानते हैं और यही वजह है कि उन्हें इंडिगो, विस्तारा या अन्य एयरलाइनों से दिल्ली और अन्य जगहों की यात्रा करनी पड़ती है।

मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में, जनवरी 2009 से 2014 के अंत तक, उमर अब्दुल्ला की राज्य सरकार के स्वामित्व वाले विमान और हेलीकॉप्टर तक पहुंच थी। ये अब उनके लिए उपलब्ध नहीं हैं! एक केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनका सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) और महत्वपूर्ण गृह विभाग पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसका मतलब है कि वह किसी भी आईएएस या आईपीएस अधिकारी का तबादला नहीं कर सकते। सभी 20 जिलों में उपायुक्त (डीसी) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) उनके नियुक्त व्यक्ति नहीं हैं।

ऐसा कोई अवसर नहीं है जब जम्मू-कश्मीर के किसी राजनेता ने इस केंद्र शासित प्रदेश के राज्य का दर्जा बहाल करने की मोदी से अपील करने से नहीं की हो। राज्य का दर्जा वापस पाने की चाहत का असली कारण दरअसल, अधिक शक्तियां प्राप्त करना है। वर्तमान में, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर में सबसे शक्तिशाली हैं। बेशक, उनकी शक्तियां सितंबर-अक्टूबर 2024 में हुए विधान सभा चुनाव से पहले की तुलना में कम हैं।

जाहिर तौर पर यहां पीएम मोदी के सामने एक कठिन विकल्प है। यदि वह जम्मू-कश्मीर के लिए राज्य का दर्जा बहाल करने के अगस्त 2019 के अपने वादे को पूरा करते हैं, तो मनोज सिन्हा की शक्तियां और कम हो जाएंगी। हालांकि, मोदी अगर अपने पैर खींचते रहते हैं, और राज्य का दर्जा बहाल नहीं करते, वह ऐसे व्यक्ति के रूप में देखे जा सकते हैं, जो अपने वादे पूरे नहीं करता है।

यह भी पढ़ें- बड़ी कामयाबी…2024 में केवल 7 कश्मीरी आतंकवाद से जुड़े, 2021 में 125 थी इनकी संख्या

यह भी पढ़ें
Here are a few more articles:
Read the Next Article