Photograph: (फेसबुक)
लुटियंस दिल्ली का 3 साउथ एवेन्यू लेन का बंगला। भारत के आठवें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जीवन से इस बंगले का एक भावनात्मक संबंध बन गया था। वे 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक देश के प्रधानमंत्री रहे तब भी वे प्रधानमंत्री आवास 7 रेसकोर्स रोड ( अब लोक कल्याण मार्ग) में शिफ्ट नहीं हुए थे।
चंद्रशेखर ने 6 मार्च 1991 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वे सिर्फ चार महीनों तक प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद अगले प्रधानमंत्री चुने जाने तक यानी 21 जून 1991 तक उन्होंने ये पद संभाला। खैर, 3 साउथ एवेन्यू लेन में उनकी पत्नी दूजा देवी और दोनो पुत्र- पंकज और नीरज का बचपन गुजरा और फिर विवाह हुए। इनके अलावा, उनके दो भाइयों के परिवार भी यहां ही रहे। चंद्रशेखर इसमें 1960 के दशक के अंत में यहां रहने के लिए आए थे।
क्यों रहते रहे साउथ एवेन्यू लेन में
चंद्रशेखर चाहते तो अकबर रोड, जनपथ या सफदरजंग रोड जैसी जगहों में सरकारी बंगला ले सकते थे। पर उन्होंने दिल्ली में अंत तक साउथ एवेन्यू लेन के एक सामान्य बंगले को अपना निवास बनाया। यह बंगला, जिसे आमतौर पर सांसदों के लिए आवंटित बंगलों में से एक माना जाता है, उनकी सादगी और जनसाधारण से जुड़ाव को दर्शाता रहा है।
चंद्रशेखर और उनकी पत्नी दूजा देवी
साउथ एवेन्यू लेन संसद भवन और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों के निकट है। यहाँ सांसदों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के लिए सरकारी बंगले और फ्लैट आवंटित किए जाते हैं। चंद्रशेखर का 3, साउथ एवेन्यू लेन में बंगला उनके व्यक्तित्व का प्रतीक था- सादा और उनके समाजवादी मूल्यों से मेल खाता हुआ। साउथ एवेन्यू लेन में टाइप-V या टाइप-VI बंगले हैं। इन बंगलों के साथ एक छोटा लॉन, कुछ कमरे, और बुनियादी सुविधाएँ होती हैं।
उसकी पहचान किनसे
लुटियंस दिल्ली के कुछ बंगलों की पहचान उन शख्सियतों से होने लगी है जिनमें वे लंबे समय तक रहीं। उनमें एक बंगला 3 साउथ एवेन्यू लेन का भी है। चंद्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर ने एक बार कहा था था, "उनका ( चंद्रशेखर) का दिन सुबह साढ़े चार बजे शुरू होता था। वो पहले योग करते थे, व्यायाम करते थे, पढ़ते थे और लिखते भी थे उसी समय। वो रोज आठ दस किलोमीटर चला करते थे।'' उनका 2007 में निधन हो गया था। यहां से ही उनकी अंतिम यात्रा निकली थी। उनके निधन के बाद उनके सांसद पुत्र नीरज को 3 साउथ एवेन्यू का बंगला मिल गया था।
विलासिता से दूर उनका आशियाना
चंद्रशेखर के बंगले का डिजाइन भी लुटियंस दिल्ली के बाकी सरकारी बंगलों की तरह औपनिवेशिक शैली में है, जिसमें सफेद दीवारें, लकड़ी के फर्नीचर, और खुले बरामदे शामिल होते हैं। चंद्रशेखर के बंगले में कोई विशेष विलासिता या आधुनिक सजावट नहीं थी। उनके निवास की सादगी इस बात से स्पष्ट होती है कि उन्होंने कभी भी अपने आधिकारिक निवास को भव्य बनाने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय, यह बंगला उनके लिए एक कार्यस्थल और विचार-मंथन का केंद्र था, जहाँ वे अपने सहयोगियों और समर्थकों के साथ मुलाकात करते थे।
चंद्रशेखर के साथ लंबे समय तक काम करने वाले लेखक अनिल अत्रि बताते हैं कि वे ( चंद्रशेखर) भले ही बड़े नेता थे और उनके सारे देश में चाहने वाले थे पर वे परिवार की संस्था में भरपूर यकीन रखते थे। उनके घर में उनका और उनके दो भाइयों का परिवार दशकों साथ-साथ रहा। सबका भोजन एक जगह बनता था। यहाँ वे अपने समाजवादी सहयोगियों, जनता दल के नेताओं, और सामान्य लोगों से मिलते थे। चंद्रशेखर का यह बंगला उनके "जननायक" व्यक्तित्व को दर्शाता था, क्योंकि यहाँ आने वाले लोग बिना किसी औपचारिकता के उनसे मिल सकते थे।
खुला मंच था 3 साउथ एवेन्यू लेन
चंद्रशेखर ने अपने बंगले को एक खुले मंच की तरह इस्तेमाल किया, जहाँ राजनीतिक चर्चाएँ, सामाजिक मुद्दों पर विचार-विमर्श, और ग्रामीण भारत के विकास से संबंधित योजनाएँ बनाई जाती थीं। उनकी प्रसिद्ध "भारत यात्रा" (1983) के दौरान एकत्रित अनुभवों को भी वे इस बंगले में बैठकर अपने सहयोगियों के साथ साझा करते थे।
इस यात्रा, जिसमें उन्होंने कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक 4,260 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थी, ने उन्हें भारत की ग्रामीण समस्याओं और जनता की आकांक्षाओं को गहराई से समझने का अवसर दिया था। साउथ एवेन्यू का यह बंगला उस विचारधारा का प्रतीक बन गया, जो चंद्रशेखर ने अपनी यात्रा और राजनीतिक जीवन में अपनाई थी।
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दिल्ली में भोजपुरी समाज के पुराण पुरुष अजीत दूबे 3, साउथ एवेन्यू लेन में चंद्रशेखर जी से मिलने दर्जनों बार गए। वे कहते हैं- यह वह स्थान था जहाँ 1990 में, जब जनता दल में टूट हुई और चंद्रशेखर ने समाजवादी जनता पार्टी बनाई, तब कई महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय लिए गए। उस समय, राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने चंद्रशेखर को समर्थन दिया था, जिसके परिणामस्वरूप वे प्रधानमंत्री बने। इस बंगले में हुई बैठकों में कई ऐतिहासिक निर्णय लिए गए, जिनमें उनकी अल्पकालिक सरकार की नीतियाँ और रणनीतियाँ शामिल थीं।
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हालांकि, चंद्रशेखर की सरकार केवल सात महीने तक चली, क्योंकि कांग्रेस ने राजीव गांधी की जासूसी के आरोप में समर्थन वापस ले लिया। इस घटना ने उनके बंगले को और भी चर्चा में ला दिया, क्योंकि यहाँ से उनकी सरकार के अंतिम दिन और इस्तीफे की घोषणा से संबंधित कई गतिविधियाँ संचालित हुईं।
साउथ एवेन्यू से भोंडसी आश्रम
चंद्रशेखर का साउथ एवेन्यू बंगला उनके भोंडसी (गुड़गांव, हरियाणा) स्थित भारत यात्रा आश्रम से गहराई से जुड़ा हुआ था। भोंडसी आश्रम, जिसे उन्होंने 1983 में स्थापित किया था, ग्रामीण विकास और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित था। जब वे दिल्ली में होते थे, तो साउथ एवेन्यू के बंगले में ही रहते, लेकिन वे अक्सर भोंडसी आश्रम में समय बिताते थे। भोंडसी आश्रम की स्थापना चंद्रशेखर ने अपनी भारत यात्रा के अनुभवों के आधार पर की थी, और यह उनके लिए एक वैचारिक केंद्र था। साउथ एवेन्यू का बंगला इस आश्रम का एक शहरी विस्तार था, जहाँ वे दिल्ली में रहते हुए अपने विचारों को लागू करने की योजना बनाते थे। जब वे भोंडसी में होते थे, तो वे पहाड़ी पर चढ़कर समय बिताते थे, और साउथ एवेन्यू में रहते हुए भी उनकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आता था।
साउथ एवेन्यू बंगले से जुड़े विवाद
चंद्रशेखर के साउथ एवेन्यू बंगले और भोंडसी आश्रम से संबंधित कुछ विवाद भी सामने आए। भोंडसी आश्रम की जमीन को लेकर 2002 में हरियाणा सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच विवाद हुआ, जब कुछ जमीन को ग्राम पंचायत को वापस करने का आदेश दिया गया। इसके अलावा, चंद्रशेखर की सरकार के दौरान राजीव गांधी पर जासूसी के आरोपों ने उनके साउथ एवेन्यू बंगले को राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना दिया। इन विवादों के बावजूद, चंद्रशेखर की सादगी और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा पर कोई सवाल नहीं उठा सका।
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एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू 3 साउथ एवेन्यू लेन में
चंद्रशेखर जी से मुझे एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने का मौका 32 साल पहले 1993 में 3 साउथ एवेन्यू करने का मौका मिला था। चंद्रशेखर जैसे कद्दावर नेता का अकेले ही इंटरव्यू करना था, इसलिए कुछ घबराहट भी थी। उनके बंगले के बाहर पहुंचा तो वहां पर उनके काफी समर्थक और फरियादी खड़े थे। खैर, मुझे उस कमरे के बाहर बिठा दिया गया जहां इंटरव्यू होना था। कुछ देर के बाद मैं चंद्रशेखर जी के सामने बैठा था इंटरव्यू करने के लिए।
इंटरव्यू शुरू होते ही वहां पर ओम प्रकाश चौटाला भी आ गए। वे सोफे पर बैठ गए। मेरी जब चंद्रशेखर जी से बातचीत हो रही थी तब वे मंद-मंद मुस्करा रहे थे। मेरे एक सवाल का जवाब चंद्रशेखर जी से पहले चौटाला देने लगे। चंद्रशेखर जी ने उन्हें तुरंत रोका। कहां- ‘आप शांत रहिए।’ चंद्रशेखर जी सभी सवालों के जवाब विस्तार से दे रहे थे।
इंटरव्यू समाप्त होने के बाद उन्होंने मेरे से संक्षिप्त में मेरे और मेरे परिवार के बारे में भी जानकारी हासिल की। इंटरव्यू हिन्दुस्तान अखबार में पूरे पेज पर छपा था। चंद्रशेखर जी का इंटरव्यू करने के बाद उनके कमरे से निकला तो बाहर दिल्ली कांग्रेस के नेता रमेश दत्ता मिल गए। रमेश दत्ता अपना गुरू मानते थे चंद्रशेखर को। मुझे याद है दिल्ली नगर निगम का 1995 का चुनाव।
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कांग्रेस ने मिन्टो रोड सीट से अपने सीटिंग पार्षद रमेश दत्ता को टिकट नहीं दिया था। रमेश दत्ता के स्थान पर टिकट दिया अरुणेश शर्मा को। वे नई दिल्ली कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। सच्चे कांग्रेसी थे। रमेश दत्ता आजाद उम्मीदवार के तौर में चुनाव लड़े। मुकाबला कांटे का था। एक दिन पता चला कि चंद्रशेखर जी रमेश दत्ता के समर्थन में मिन्टो रोड में चुनावी सभाओं को संबोधित करेंगे। वे आए और रमेश दत्ता के लिए वोट मांगे। एक पूर्व प्रधानमंत्री नगर निगम चुनाव में आजाद उम्मीदवार के लिए लिए वोट मांग रहा था। यह चंद्रशेखर ही कर सकते थे।
हारने पर भी रहते रहे 3 साउथ एवेन्यू लेन में
चंद्रशेखर 1984 का लोकसभा चुनाव बलिया से हार गए। उस समय वे जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में कांग्रेस के हक में सहानुभूति लहर बह रही थी। उसमें चंद्रशेखर के साथ-साथ कई और बड़े नेता भी हार गए थे। अब चंद्रशेखर को अपना 3 साउथ एवेन्यू लेन का बंगला खाली करना था। फिर भी क्यों उन्होंने अपने बंगले को नहीं छोड़ा? जाने-माने पत्रकार अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि चंद्रशेखर जी अपने बंगले में इसलिए रहते रहे क्योंकि तब राजीव गांधी की एक पहल पर सरकार ने फैसला लिया कि लोकसभा चुनाव में जो किसी दल के नेता हारे हैं, उन्हें सरकारी आवास खाली करने की जरूरत नहीं है। इस तरह चंद्रशेखर 3 साउथ एवेन्यू लेन में रहते रहे।
कौन पिटा था 3, साउथ एवेन्यू के बाहर
लोकसभा के 1989 के चुनावों के नतीजे आने के बाद यह तय हो गया कि सरकार जनता दल की बनेगी। प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसके लिए एक मीटिंग हुई उड़ीसा भवन में जहाँ ये तय हुआ कि देवीलाल जी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया जाएगा और देवीलाल जी इससे इनकार कर चंद्रशेखर जी का नाम प्रस्तावित करेंगे। लेकिन ये सब तय होने के बाद जब संसद के एनेक्सी भवन में सांसदो की मीटिंग हुई तो देवीलाल ने चंद्रशेखर की जगह विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया। ये कहते हुए कि वो 'हरियाणा के ताऊ बन के ही रहना चाहते हैं, प्रधानमंत्री का पद विश्वनाथ प्रताप को दे दिया जाए।
चंद्रशेखर के लिए ये खबर किसी वज्रपात से कम न थी। ऐसे ही माहौल में रामजेठमलानी ने घोषणा की कि यदि चंद्रशेखर जी ने वीपी सिंह को अपना नेता नहीं माना तो वे चंद्रशेखर जी के आवास के आगे धरना देंगे। यह बात जब चंद्रशेखर जी को पता चली तो उन्होंने जेठमलानी जी को फोन कराया लेकिन वे मिले नहीं, तब उनके पुत्र से बात हुई और उन्हें कहा गया कि वे जेठमलानी जी को धरने पर बैठने से रोके। लेकिन जेठमलानी जी तो उस समय देश के सबसे चर्चित, सबसे बड़े वकील होने के गुमान में थे और साथ ही साथ उनमें कहीं न कहीं नए बनने वाले मंत्रिमंडल में मंत्री पद की चाह भी थी। वे चंद्रशेखर जी की गुजारिश को दरकिनार कर 30, नवम्बर 1989 को 3, साउथ एवेन्यू के आगे धरने पर बैठ जाते हैं।
जेठमलानी के इस कदम से नाराज चंद्रशेखर के बहुत से समर्थक जेठमलानी जी के पास पहुंचते हैं और उनको गिरा के भोजपुरी में गालियों के साथ लातों-घूंसों की बौछार करने लगते हैं। अरविंद कुमार सिंह, जो उस घटना के प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे, अपने फोटो ग्राफर मित्र राम भरत यादव के साथ, बताते हैं कि जेठमलानी के इस केस की पुलिस में शिकायत भी नहीं की थी।
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कनॉट प्लेस में चंद्रशेखर
चंद्रशेखर जी को मैंने कनॉट प्लेस में अपने कुछ मित्रों के साथ घूमते हुए देखा। उनके साथ पी.एन. सिंह अवश्य रहा करते थे। पी.एन. सिंह चंद्रशेखर का लघु संस्करण ही लगते थे। इमरजेंसी में जेल भी गए थे। यह बातें 1970 के दशक के अंत और 1980 के शुरू की हैं।
आज भी चंद्रशेखर की विरासत का हिस्सा है। चंद्रशेखर जैसे नेताओं की कहानियाँ और उनके निवास स्थान हमें यह सिखाते हैं कि सत्ता का असली मोल जनता की सेवा में है, न कि भौतिक वैभव में।