दिल्ली का हौज खास। यह एक ऐसा एरिया है, जो न केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां पंजाबी साहित्य की महान लेखिका अमृता प्रीतम का आशियाना भी रहा। के-25, हौज खास, वह घर था, जो न सिर्फ अमृता का निवास था, बल्कि साहित्य, कला और बौद्धिक विमर्श का एक जीवंत केंद्र भी था। यह घर केवल ईंटों और पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि यह उन विचारों, भावनाओं और रचनाओं का गवाह था, जो अमृता और उनके साथी कलाकारों ने वहां साझा किए।
हौज खास: खिलजी से अमृता तक
हौज खास, दिल्ली का एक ऐसा क्षेत्र है, जो मध्यकालीन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के समय से अपनी पहचान रखता है। 13वीं शताब्दी में निर्मित जलाशय और उसके आसपास बसे गांव ने इस इलाके को ऐतिहासिक महत्व दिया। लेकिन 20वीं सदी में, खासकर भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, हौज खास एक पॉश कॉलोनी के रूप में उभरा। 1950 के दशक में, दिल्ली के तत्कालीन कमिश्नर डॉ. एम.एस. रंधावा ने पंजाबी लेखकों को इस क्षेत्र में प्लॉट आवंटित किए, जिसके परिणामस्वरूप अमृता प्रीतम जैसी साहित्यिक हस्तियों ने यहां अपने घर बनाए।
प्रेम का गवाह घर
अमृता प्रीतम का हौज खास में घर एक ऐसी जगह थी, जहां साहित्य, कला और विचारों का संगम होता था। यह मकान न केवल उनके निजी जीवन का हिस्सा था, बल्कि यह पंजाबी और हिंदी साहित्य की दुनिया का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बन गया। अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में हुआ था। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, 1947 में उनका परिवार दिल्ली आ बसा।
अमृता ने हौज खास में अपना घर बनाया, जो उनके साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यह घर उनके लिए एक शरणस्थली था, जहां वे अपनी रचनाओं को आकार देती थीं और अपने समकालीन लेखकों, कवियों और कलाकारों के साथ विचार-विमर्श करती थीं।हौज खास का यह मकान उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी रहा। यह घर अमृता और उनके साथी, चित्रकार और लेखक इमरोज के प्रेम का भी गवाह था, जिनके साथ उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए।
हौज खास के घर की साहित्यिक महफिलें
अमृता का हौज खास वाला घर केवल उनका निवास स्थान नहीं था, बल्कि यह साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक केंद्र था। यहां नियमित रूप से लेखकों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों की महफिलें सजती थीं। इन बैठकों में पंजाबी और हिंदी साहित्य के दिग्गज शामिल होते थे। इन महफिलों में कविता पाठ, कहानी चर्चा, और बौद्धिक विमर्श का दौर चलता था।
अमृता की साहित्यिक पत्रिका नागमणि का संपादन भी यहीं से होता था। इस पत्रिका ने पंजाबी साहित्य को एक नया आयाम दिया और कई नए लेखकों को मंच प्रदान किया। इन साहित्यिक बैठकों में न केवल स्थापित लेखक, बल्कि उभरते हुए कवि और लेखक भी शामिल होते थे, जो अमृता की रचनाओं और विचारों से प्रेरणा लेते थे।
इन महफिलों में कविता और कहानी के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी चर्चा होती थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन का दर्द, जो अमृता की रचनाओं का एक प्रमुख विषय था, इन बैठकों में भी गूंजता था। उनकी कविता अज्ज आखां वारिस शाह नूं की पंक्तियां अक्सर इन सभाओं में पढ़ी जाती थीं, और यह कविता दोनों देशों के साहित्य प्रेमियों के बीच एक सेतु की तरह थी।
घर में आने वाले मेहमान
अमृता के हौज खास वाले घर में कई नामी-गिरामी हस्तियां आती थीं। इनमें साहित्यकार, कवि, चित्रकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल थे। कहते हैं कि मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी, जिनके साथ अमृता का गहरा भावनात्मक रिश्ता था, उनके घर के नियमित मेहमान थे। साहिर की शायरी और अमृता की कविताओं के बीच एक गहरी समानता थी, और दोनों अक्सर साहित्य और कला पर गहन चर्चा करते थे। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह भी अमृता के घर आने वाले प्रमुख साहित्यकारों में से एक थे। उनकी हास्य भरी बातें और साहित्यिक विचारों ने इन महफिलों को और जीवंत बनाया।
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ड्राइंग रूम में कविता
उनके घर के ड्राइंग रूम में अमृता जी की कुछ पंक्तियों को दिवार पर उनके मित्र इमरोज ने सुंदर तरीके से लिखा था।
आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है।
अमृता प्रीतम के साथ इमरोज
अमृता प्रीतम के साथ इमरोज का नाम तो सब लेते हैं लेकिन उनके बारे में लोग कितना जानते हैं? वरिष्ठ लेखक डॉ. प्रभात रंजन बताते हैं कि जिस समय हिंदी में लोकप्रिय उपन्यासों की लोकप्रियता अपने चरम पर थी उस समय इमरोज उन किताबों कवर बनाया करते थे। उस जमाने में कवर का महत्व भी किताबों की तरह ही होता था और इमरोज इस फन के सबसे माहिर कलाकारों में थे। कहते हैं कि उनको हर टाइटल के लिए उतना ही भुगतान होता था जितना कि लेखक को। यह बहुत बड़ी बात थी। अमृता प्रीतम के किताबों के भी कवर उन्होंने बनाए थे। वे स्टार टाइटल मेकर या आज की शब्दावली में कहें तो कवर डिज़ाइनर थे। कभी उस ज़माने की किताबों को उनके कवर से याद किया जाएगा तो इमरोज को भी याद किया जाएगा। उनकी उस पहचान को जो अमृता से अलग होगी।
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मशहूर उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक कहते हैं कि इमरोज उर्फ़ इंद्रजीत को गुरुदत्त ने बतौर आर्ट डायरेक्टर साइन भी कर लिया था, पर वे अमृता प्रीतम के लिए बम्बई छोड़ दिल्ली आ गए थे। सिर्फ़ एक फिल्म, जो धर्मेन्द्र, मीना कुमारी की आख़िरी फ़िल्म थी- बहारों की मंज़िल, थ्रिलर थी, उसके आर्ट डारेक्टर थे इमरोज।
अमृता के घर में शिव बटालवी और फैज
हौज खास के घर को अमृता जी ने खुद सजाया-संवारा था । यह घर इमरोज की पेंटिंग और अमृता की लिखी नज्मों का गवाह था। यह घर कला का एक ख्वाबगाह था। के- 25 हौज खास में शिव कुमार बटालवी और पाकिस्तान से विशेषकर लेखक जब आते थे फैज़ अहमद फैज़ का मुशायरा घर के टेरस पर आयोजित किया जाता था। कहते हैं कि अमृता जी की शिव बटालवी से गुजारिश रहा करती थी कि वो कोई मकूबल रचना का पाठ करें। शिव ने यहां पर कई बार अपनी मशहूर रचना सुनाई-
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा,
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए
मैंनू एहो हिसाब लै बैठा
चंगा हुंदा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब लै बैठा
दिल दा डर सी किते न लै बैठे
लै ही बैठा जनाब लै बैठा।
यहां पर गुलजार, सरदार नानक सिंह ( पवित्र-पापी फिल्म के निर्माता), डॉ. हरभजन, गुरुबख्श सिंह, महेन्द्र सिंह सरना ( भारत के अमेरिका में एंबेसेडर रहे नवतेज सरना के पिता), कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी, उद्य़ोगपति सागर सूरी, पंजाबी के गायक केसर सिंह नरूला ( जसपिंदर नरूला के पिता) लगातार आते-जाते रहते थे। एक बार काव्य की धारा बहने लगती तो फिर वे अलसुबह तक जारी रहती। इस बीच, केसर सिंह नरूला और उनकी पत्नी मोहिनी नरूला किसी महफिल में पंजाबी का सदाबहार लोकगीत लट्ठे दि चादर, उत्ते सलेटी रंग माइया गाने के बाद शिव बटालवी की रचनाएं सुनाते थे।
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इसके अलावा, कई उभरते हुए लेखक और कवि भी अमृता के घर आते थे, जो उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेना चाहते थे। अमृता का व्यक्तित्व इतना आत्मीय था कि वे हर किसी को अपने विचार साझा करने का अवसर देती थीं।
महफिलों का माहौल
अमृता के घर की महफिलें केवल औपचारिक साहित्यिक चर्चाओं तक सीमित नहीं थीं। ये सभाएं एक तरह का सांस्कृतिक उत्सव होती थीं, जहां कविता, कहानी, संगीत और चित्रकला का संगम होता था। इमरोज की चित्रकारी और अमृता की लेखनी के बीच एक अनोखा तालमेल था, जो इन महफिलों को और रंगीन बनाता था।
इन बैठकों में अक्सर देर रात तक चर्चाएं चलती थीं। चाय की प्यालियां, सिगरेट का धुआं, और कविताओं की गूंज इन महफिलों का हिस्सा थी। साहिर की शायरी, अमृता की कविताएं, और अन्य लेखकों की रचनाएं पढ़ी जाती थीं। कभी-कभी इन सभाओं में पंजाबी लोकगीत और गजलें भी गूंजती थीं।
नेपाल के उपन्यासकार धूसवां सायमी ने 1972 में अमृता की रचनाओं के बारे में लिखा था कि उनकी लेखनी में मानवीय संवेदनाओं का सटीक चित्रण है। यह चित्रण न केवल उनकी रचनाओं में, बल्कि उनके घर की उन महफिलों में भी झलकता था, जहां लोग अपने दिल की बातें साझा करते थे।
अमृता प्रीतम का हौज खास वाला घर, के-25, केवल एक मकान नहीं था, बल्कि यह साहित्य, कला और संस्कृति का एक जीवंत केंद्र था। इस घर की दीवारें उन कविताओं, कहानियों और चर्चाओं की गवाह हैं, जो अमृता और उनके समकालीनों ने साझा कीं। साहिर लुधियानवी, इमरोज, खुशवंत सिंह जैसे साहित्यकारों की मौजूदगी ने इस घर को एक सांस्कृतिक तीर्थस्थल बना दिया।
आज भले ही अमृता हमारे बीच न हों और उनका वह मकान अब बिक चुका हो, लेकिन उनकी रचनाएं और उन महफिलों की यादें आज भी जीवित हैं। हौज खास का वह घर पंजाबी और हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर का प्रतीक है, जो हमेशा साहित्य प्रेमियों के दिलों में बसा रहेगा।